सम्पादकीय

ममता की अजब सियासी नौटंकी

क्या किसी घोटाले की जांच में जान-बूझकर गड़बड़ी करने वाले अधिकारी से पूछताछ करने से लोकतंत्र, संविधान और संघीय ढांचा खतरे में पड़ जाता है? पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का तो यही मानना है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट उनसे सहमत नहीं हुआ और कहा कि सीबीआई कोलकाता के पुलिस आयुक्त से पूछताछ करेगी। इसके साथ ही राज्य के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और कोलकाता पुलिस आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का नोटिस भी जारी कर दिया। इसके बावजूद ममता बनर्जी इसे अपनी नैतिक जीत बता रही हैं। कई विपक्षी दल भी ममता के साथ खड़े हैं। किसी ने भी यह पूछना जरूरी नहीं समझा कि ममता भ्रष्टाचार के मामले की जांच में गड़बड़ करने के आरोपी को आखिर क्यों बचाना चाहती हैं?
भारत की राजनीति एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है, जहां नेताओं का भ्रष्टाचार में लिप्त होना या भ्रष्टाचारियों का बचाव करना नया सामान्य (न्यू नार्मल) हो गया है। अभी पांच साल पहले राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस में अपनी ही सरकार के एक विधेयक की प्रतीकात्मक प्रति फाड़ दी थी। यह विधेयक भ्रष्ट और अपराधी नेताओं को तीन साल से ज्यादा की सजा होने पर चुनाव लड़ने से रोकने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलने के लिए था। उसका तात्कालिक लाभ लालू प्रसाद यादव को मिलने वाला था। उन्हीं राहुल गांधी को अब लालू यादव से कोई परहेज नहीं है। उन्हें चिटफंड घोटाले की जांच में आरोपियों को बचाने के लिए सुबूतों से छेड़छाड़ करने के आरोपी कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार को बचाने की ममता बनर्जी की कोशिश का समर्थन करने से भी गुरेज नहीं है। यह बात और है कि कांग्रेस की प्रदेश इकाई कह रही है कि राज्य में संवैधानिक ढांचा चरमरा गया है और वहां राष्ट्रपति शासन लगना चाहिए।

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