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रियासत के सियासतदार : नौ बार लोकसभा चुनाव जीत अपराजेय रहे माधवराव सिंधिया

राजमाता विजयाराजे सिंधिया के 1967 में कांग्रेस छोड़ने के तीन दशक बाद एक मौका फिर आया जब सिंधिया घराने के माधवराव ने कांग्रेस पार्टी छोड़ी। उन्होने अपनी पार्टी बनायी और रिकॉर्ड वोटों से चुनाव जीते। माधवराव सिंधिया के सियासी सफ़र का वर्णन करता यह ख़ास लेख |

इंग्लेंड से पढ़ कर लौटे माधवराव ने सं 1970 में जनसंघ की सदस्यता ली और 1971 के चुनाव में गुना से लोकसभा चुनाव जीता। आपातकाल के बाद सन 77में चुनाव हुआ और तब तक माधवराव का जनसंघ से मोह भंग हो चुका था।

लेखक : डॉ. राकेश पाठक, प्रधान संपादक कर्मवीर

आम चुनाव से पहले उन्होने जनसंघ से नाता तोड़ लिया और गुना से निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया।कांग्रेस ने पहली ही फुर्सत में उन्हें समर्थन देने की घोषणा कर दी।आपको याद होगा कि 1977के चुनाव से पहले गैर कांग्रेस दलों ने मिलकर जनता पार्टी बना ली थी। इसके एक घटक ‘भारतीय लोकदल’ के चुनाव चिन्ह ‘हलधर किसान’ पर ही जनता पार्टी के लोग चुनाव लड़े।गुना में कांग्रेस समर्थित माधवराव राव ने जनता पार्टी के गुरुबख्श सिंह को हराया।अंचल की बाकी तीन सीटों पर जनता पार्टी के प्रत्याशी जीते।
राजमाता ने इस दफ़ा चुनाव नही लड़ा और अटल बिहारी बाजपेयी दिल्ली चले गये।
● 1980 में कांग्रेस में शामिल हुये माधवराव
अगले आम चुनाव से पहले माधवराव कांग्रेस में शामिल हो गये। वे लगातार तीसरी बार गुना से लड़े और जनता पार्टी के नरेश जौहरी को एक लाख 16 हज़ार 126 वोट से हराया।1980 के चुनाव में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हुयी।
● अटल बिहारी बाजपेयी को मात
माधवराव सिंधिया के सियासी जीवन में दिग्गज नेता अटल बिहारी बाजपेयी को हारने का रिकॉर्ड भी दर्ज है। इंदिरा गाँधी को हत्या के बाद सं 84 में चुनाव हुये ।
राजीव गांधी ने नामांकन दाखिले के आखिरी वक्त पर माधवराव को अटल जी के खिलाफ ग्वालियर सीट पर परचा भरवा दिया। अटल जी
आनन फानन में दूसरी सीट भिंड से परचा भरने दौडे लेकिन समय निकल गया तो आधे रास्ते में गोहद से लौट आये।राजमाता के अलावा दो दशक के सिंधिया घराने का कोई व्यक्ति ग्वालियर से मैदान में था।भारी जन समर्थन मिला और माधवराव ने अटल बिहारी जैसे दिग्गज को पौने दो लाख वोटों से शिकस्त दी।

दुर्लभ तस्वीर : युवा माधवराव ऑक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी पढ्ने जाने वाले थे।तब ग्वालियर में महाराज बाड़े पर सार्वजनिक विदाई और अभिनदंन समारोह हुआ था| चित्र उसी अवसर का है जिसमें मंचासीन हैं तत्कालीन महापौर डॉ रघुनाथ राव पापरीकर और बहन वसुंधरा राजे के साथ माधवराव सिंधिया।

● विकास कांग्रेस बना कर रिकॉर्ड वोटों से जीते
राजीव गांधी की हत्या के बाद पीवी नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने।उनकी सरकार में माधवराव मानव संसाधन मंत्री थे। 1995के आखिर में “जैन हवाला डायरी” का जिन्न बाहर आया और देश की राजनीति में भूचाल आ गया।
इस डायरी में लालकृष्ण आडवाणी , शरद यादव और माधवराव सिंधिया सहित कई दिग्गजों के नाम थे।सबसे पहले शरद यादव ने फिर आडवाणी ने लोकसभा से इस्तीफा दे दिया।एक जनवरी 1996को माधवराव ने पहले लोकसभा फिर कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। असल में नरसिंह राव ने कह दिया था कि हवाला के आरोपियों को पार्टी टिकिट नहीं मिलेगा। माधवराव ने मप्र विकास कांग्रेस नाम से पार्टी खड़ी की और उसके ‘उगता सूरज’ चुनाव चिन्ह पर ग्वालियर से लड़े।
वैसे यह पार्टी विदिशा के डॉ मरखेड़कर के नाम से रजिस्टर्ड थी।वे सिंधिया के करीबी थे। राजमाता की इच्छा पर इस चुनाव में बीजेपी ने कोई प्रत्याशी नहीं उतारा।कांग्रेस ने स्वतंत्रता सेनानी शशि भूषण बाजपेयी को मैदान में उतारा लेकिन उनकी जमानत जब्त हो गई।माधवराव ने ढाई लाख वोटों से जीत दर्ज की।
#प्रसंगवश -शशि भूषण बाजपेयी अपने दौर के सूरमा थे। वे किसी जमाने में जनसंघ के अध्यक्ष प्रो बलराज मधौक और रामचंद्र ‘बड़े’ जैसे नेताओं को चुनाव हरा चुके थे।

माधवराव सिंधिया को जनसंघ की सदस्यता दिलाते अटल बिहारी वाजपेयी |

● नौ बार जीत कर अपराजेय माधवराव बाद में कांग्रेस में वापस आ गये।
1998में उन्हें ग्वालियर में बीजेपी के जयभान सिंह पवैया से कड़ी टक्कर मिली लेकिन वे ही जीते। अगले आम चुनाव में 1999 के मध्यावधि चुनाव में माधवराव एक बार फिर गुना सीट पर लौटे।जीवन का पहला चुनाव भी यहीं से लड़े थे।
यह उनके जीवन का नौवां और अन्तिम चुनाव था।इस चुनाव में वे ढाई लाख से ज्यादा वोटों से जीते।
यह सोनिया गांधी का युग था।माधवराव लोकसभा में उप नेता बनाये गये। इस दौर वे प्रधानमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार माने जाने लगे थे।
दुर्योग से 30 सितम्बर 2001को एक विमान दुर्घटना में उनका निधन हो गया।उस दिन वे कांग्रेस के चुनाव प्रचार के लिये उत्तर प्रदेश जा रहे थे।

▪अगली किस्त में पढ़िए @ ज्योतिरादित्य सिंधिया का सियासी सफ़र


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