कुछ दिल से ....

ग्वालियर राजघराने को राजनीति में सरसब्ज देखना नहीं चाहते हैं दिग्विजय, तभी खटकते हैं सिंधिया

  • मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने अपने बयानों से यह जाहिर कर दिया है कि उनकी असल दुश्मनी भाजपा से नहीं, सिंधिया से है। तभी तो उन्होंने कांग्रेसजनों के नाम जारी अपील में कहा है कि कांग्रेस को खत्म करना है तो कर दो, उसके लिए हजार अवसर मिलेंगे। लेकिन पहले इन 22 को हराना जरूरी है। आज कांग्रेस वैसे ही गर्त में है।

    भौजी (कमलनाथ) की अक्ल ठिकाने लगाई जा चुकी है, भले ही इसके लिए भैया (कांग्रेस) की बलि क्यों न देनी पड़ गई हो। लेकिन नेताओं की मति विपरीत है। पर्दे के पीछे रहकर प्रदेश सरकार को ध्वस्त किया जा चुका है। अब कांग्रेस को मिटा देने की बात की जा रही है, वह भी इस कीमत पर कि कांग्रेस को मिटाना है तो मिटा देना, इसके लिए अनेक अवसर भी मिलेंगे। लेकिन ये 22 नहीं जीतना चाहिए। तो इसके लिए कांग्रेस को इस बात का मंथन अवश्य करना चाहिए कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी की दुर्दशा और कांग्रेसनीत प्रदेश सरकार को गिराने अथवा गिरवाने के लिए असल दोषी कौन रहा। मसलन, मध्य प्रदेश का वह कौनसा एक मात्र नेता है जो किसी भी सूरत में ग्वालियर राजघराने को राजनीति में सरसब्ज (खुशहाल, फलता-फूलता ) देखना नहीं चाहता।

कांग्रेस को पता लगाना चाहिए, वो कौन है जो परदे के पीछे रहकर, अपने समर्थक घाघ नौकरशाहों की दम पर समानांतर सरकार चलाता रहा। कौन है वो कांग्रेसी नेता जिसने पहले मुख्यमंत्री पद पर फिर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद पर मनोनयन के वक्त सिंधिया की राह में कांटे बिछाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। कांग्रेस को क्या इस बात का पता नहीं चलना चाहिए कि किसने सरकारी क्रियाकलापों में दखल दे देकर हर वो परिस्थिति निर्मित कीं, जिससे कमलनाथ और सिंधिया के बीच मतभेद बढ़ते चले गए, जो अंतत: मनभेद की हद तक जा पहुंचे। इतने कि कांग्रस को सरकार के द्वार तक लाने में महती भूमिका निभाने वाले सिंधिया को कहना पड़ गया कि मुझे सडक़ पर उतरने को मजबूर मत करो और इधर नाथ ने भी कह दिया कि उतरना है तो वह भी करके देख लो। 

नतीजा सबके सामने है, भीतरघात करने की बजाय सिंधिया पार्टी ही छोड़ कर चले गए। साथ में 22 विधायकों ने सत्ता के आवरण को त्यागकर अपने नेता का अनुसरण करके निष्ठाएं असंदिग्ध कर दीं। अब वक्त है पार्टी को एक जुट करने का तो एक नेता होने के नाते दिग्गी राजा की सोच व्यापक होनी चाहिए। उन्हें ये संदेश देना था कि कांग्रेस बची रही तो बहुत सारे 22 आ जाएंगे, अत: हमें अपनी पार्टी को मजबूत करने के लिए उसकी रीति नीति को एक बार फिर युद्ध स्तर पर जन जन तक पहुंचाना चाहिए। लेकिन नही, उनका लक्ष्य तो सिंधिया के रूतबे हो धूल धुसरित करना है, न कि कांग्रेस को उत्थान की ओर ले जाना। इसीलिए उनके मुख से अक्सर ऐसी बातें निकलती रही हैं, जो बेशक सिंधिया समेत उनके अन्य विरोधियों के आभा मंडल को दूषित करने का असफल प्रयास करती प्रतीत होती हैं, लेकिन इससे कांग्रेस की भी थुक्का फजीहत होती रही है|

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उदाहरण के लिए- एक सोची समझी रणनीति के तहत आज भी सरकार और कांग्रस के पतन के लिए सिंधिया को ही दोषी ठहराने के सुनियोजित प्रयास जारी हैं। ये व्यक्तिगत वैमनस्यता की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है? अब जो नेता आपकी पार्टी में रहा ही नहीं, उस व्यक्तित्व के बारे में, उसकी पीठ पीछे यह दोषारोपण का निंदनीय प्रयास कब उचित माना जाता रहेगा? जहां तक सिंधिया की बात है तो उनके समर्थकों का कहना हमेशा यही रहा कि हमारी अनदेखी हो रही है। हमारे द्वारा प्रस्तुत जनहितैषी कार्य रद्दी की टोकरियों में डाले जा रहे हैं। चेतावनियां तक दी गईं, तब इन शाब्दिक जुगालियां करने वाले स्वयंभू कांग्रेसजन को क्या हो गया था।मतलब, किए धरे पर पानी फेरना
तब क्यों इन्होंने अपनी महानता का परिचय नहीं दिया और क्यों कांग्रेस को बचाने का प्रयास नहीं किया? कारण साफ है, सिंधिया सहन नहीं थे और न हो रहे थे। ये बात तत्कालीन मुख्यमत्री को देर से समझ में आईं। अंतत: उनका दर्द भी छलक ही पड़ा और प्रेस के सामने बेहद मर्यादित शब्दों में कह बैठे कि मै तो भरोसे में मारा गया। मुझे अंत तक यही बताया गया कि सिंधिया अकेले जाते हैं तो जाएं, उनके साथ एक भी विधायक नहीं जाने वाला। अब एक बार फिर कांगे्रस पर प्रहार की तैयारी उसके अपने घर से, उसके ही नेता द्वारा यह कह कर की गई है कि कांग्रेस को भले ही मिटा देना, लेकिन ये 22 नहीं जीतना चाहिए। क्या कांग्रेस को इस नासमझी पर संज्ञान नहीं लेना चाहिए, या अभी कुछ और बर्बादी देखना बाकी है?

Posted By : Vijay Pandey


  • यह लेख ज्योतिरादित्य सिंधिया फैन्स क्लब पर की गई पोस्ट का अक्षरशः विवरण है|| 
  • Jyotiraditya Madhavrao Scindia Scindia Fans Club

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