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सिंधिया ने सम्मान की चाह में बदली राह ,भाजपा में जाकर भी कम नहीं हुआ संघर्ष, अब भी आसान नहीं डगर

  • इस बात में दो राय नहीं कि मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार की वापसी का एकमात्र कारण ज्योतिरादित्य सिंधिया रहे हैं, जो कि अपने डेढ़ दर्जन विधायकों को इस्तीफा दिलाकर खुद भाजपा में शामिल हुए और सरकार बनने की परिस्थितियां निर्मित हुई। सिंधिया के कांग्रेस छोडऩे के पीछे तर्क दिया गया था कि कांग्रेस में उन्हें पर्याप्त सम्मान नहीं मिल रहा लेकिन यदि अब तक के उनके भाजपा में आगमन के बाद के सफर को देखें तो यहां भी उनके मन मुताबिक वैसा कुछ नहीं हो पाया जिसकी चाह लेकर वे भाजपा में शामिल हुए थे। 
  • सिंधिया समर्थकों को अभी भी है भाजपा में ठौर-ठिकाने की तलाश, नहीं मिल रहा है सम्मान
    भाजपाईयों की बयानबाजी और कांग्रेसियों की घेराबंदी से बढ़ रही हैं सिंधिया खेमे की बेचैनी
    बागी पूर्व विधायकों को टिकट देने के प्रश्न पर भी टालमटोल जवाब दे रहे हैं भाजपा के दिग्गज

संजय बेचैन
ग्वालियर के पूर्व महाराजा ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए संघर्ष का दौर अभी खत्म नहीं हुआ है सत्तारूढ़ भाजपा से रह….रहकर हो रही बयानबाजी इस बात का परिचायक है कि भाजपा के तमाम बड़े छत्रप सिंधिया को भाजपा में आत्मसात नहीं कर पा रहे हैं। क्योंकि सिंधिया स्थापित होते हैं तो इन दिग्गजों की छत्रपी और राजनैतिक भविष्य खतरे में पड़ता है।

|| संजय बैचेन, लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं  ||

सिंधिया के लिए मौजूदा परिस्थितियां सहज नहीं कही जा सकती। इस बात में दो राय नहीं कि मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार की वापसी का एकमात्र कारण ज्योतिरादित्य सिंधिया रहे हैं, जो कि अपने डेढ़ दर्जन विधायकों को इस्तीफा दिलाकर खुद भाजपा में शामिल हुए और सरकार बनने की परिस्थितियां निर्मित हुई। सिंधिया के कांग्रेस छोडऩे के पीछे तर्क दिया गया था कि कांग्रेस में उन्हें पर्याप्त सम्मान नहीं मिल रहा लेकिन यदि अब तक के उनके भाजपा में आगमन के बाद के सफर को देखें तो यहां भी उनके मन मुताबिक वैसा कुछ नहीं हो पाया जिसकी चाह लेकर वे भाजपा में शामिल हुए थे। अब देखना होगा कि  ……ना तो अभी तक ज्योतिरादित्य सिंधिया को केंद्रीय मंत्रिमंडल में स्थान मिल सका है और ना ही उनके साथ मंत्री पद और और अपनी विधायकी से इस्तीफा देकर भाजपा में आए सभी पूर्व मंत्री भी अब तक शिवराज कैबिनेट में स्थान नहीं पा सके हैं। सरकार बने 2 माह से अधिक वक्त हो गया है लेकिन अभी तक खुद सिंधिया सहित उनके तमाम समर्थक यहां माकूल ठौर ठिकाना हासिल नहीं कर पाए हैं।
केंद्रीय मंत्रिमंडल में ज्योतिरादित्य सिंधिया को शामिल करने का जहां तक प्रश्न है वह कोरोना महामारी के कारण अटक गया है। क्योंकि जब राज्यसभा चुनाव ही अधर में लटके हुए हैं तो मंत्रिमंडल में स्थान का मुद्दा तो दूसरी पायदान पर आता है। अभी तो उसके पूर्व सिंधिया को राज्यसभा में पहुंचना होगा लेकिन इस बीच उनके तमाम समर्थकों को शिवराज मंत्रिमंडल में तो स्थान दिया ही जा सकता था, जो कि अब तक नहीं दिया गया है। इसके लिए भी उन्हें दिल्ली दौड़ लगाना पड़ रही है। तुलसी सिलावट को कमलनाथ सरकार में डिप्टी सीएम बनवाने को लेकर ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ के बीच तल्खिय़ां पैदा हुई थीं, क्योंकि कमलनाथ ने तुलसी सिलावट को डिप्टी सीएम बनाने से साफ मना कर दिया था अब जबकि शिवराज सरकार का उदय ज्योतिरादित्य सिंधिया की बदौलत हुआ है। ऐसे में वे आने वाले कल में यदि अपने किसी भी समर्थक को डिप्टी सीएम का ओहदा दिला पाते हैं तो यह उनकी एक बड़ी राजनीतिक जीत होगी। 

’फिलहाल तो उन्हें अपने सभी पूर्व मंत्रियों को मंत्रिमंडल में ही स्थान दिलाने के लिए ही लंबी प्रतीक्षा करना पड़ी है। भाजपाई खेमे से जिस तरह के बयान सामने आ रहे हैं उनके दृष्टिगत अब इस बात पर भी ऊहापोह की स्थिति पैदा हो गई है कि क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़कर आए सभी पूर्व विधायकों को भाजपा टिकट देती भी है अथवा नहीं? गत दिवस ग्वालियर सांसद विवेक नारायण शेजवलकर ने पोहरी और करेरा विधानसभा से दोनों पूर्व विधायक सुरेश राठ खेड़ा एवं जसवंत जाटव को उपचुनाव में टिकट देने के प्रश्न को बड़ी साफगोई के साथ यह कह कर टाल दिया था कि कांग्रेसी कुशासन को दूर करने के लिए जो लोग विधायकी का त्याग करके भाजपा में आए हैं आगामी उपचुनाव में उन्हें टिकट मिलेगा या नहीं ? सवाल इस बात का नहीं क्योंकि उपचुनाव में साख इन पूर्व विधायकों की दांव पर नहीं लगी बल्कि दांव पर भाजपा की साख लगी है। चुनावी बैठक में भी वे मंडल अध्यक्षों के समक्ष पोहरी के पूर्व विधायक सुरेश राठ खेड़ा को प्रत्याशी बतौर प्रस्तुत करने से पल्ला झाड़ गए। 

प्रदेश में होने वाले उपचुनावों में ज्योतिरादित्य सिंधिया को चेहरा बनाने के सवाल पर भी उन्होंने दो टूक कहा कि शिवराज और सिंधिया भाजपा के नेता हैं पर चुनाव में चेहरा तो भारतीय जनता पार्टी का रहेगा।
सिंधिया के सहारे सरकार बनाने वाली भारतीय जनता पार्टी की अंदरूनी दुश्वारियां भी कम नहीं हैं। भाजपा के जिन नेताओं का राजनीतिक भविष्य सिंधिया और उनके समर्थकों के भाजपा में शामिल होने से दांव पर लगा है, वे बुरी तरह छटपटा रहे हैं। कईयों ने तो अभी से बागी तेवर दिखाना भी शुरू कर दिए हैं और इशारे- ही -इशारों में यह तक बताने से नहीं चूक रहें कि यदि टिकट कटा या उनके राजनीतिक भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा तो उनके लिए भी विकल्प खुले हुए हैं!
कांग्रेस भी ऐसे नेताओं के असंतोष को भुनाने के लिए तैयार बैठी है भाजपा के असंतुष्ट को कांग्रेस उप चुनाव में टिकट देकर इस मुकाबले को रोचक बना सकती है। इन परिस्थितियों में सभी सिंधिया समर्थक 22 पूर्व विधायकों को टिकट मिलता है तो भाजपा की अंतर्कलह भी सतह पर आना तय है। सांवेर के पूर्व विधायक और कांग्रेस से भाजपा में आए प्रेमचंद गुड्डू ने तो साफ तौर पर सिंधिया विरोधी बयानी शुरू कर दी है । कांग्रेस में महाराजा की हैसियत रखने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया के विरुद्ध उनके विरोधी कांग्रेसी भी अब सक्रिय हो गए हैं।
ज्योतिरादित्य के विरुद्ध ग्वालियर में लगाए गए गुमशुदगी के पोस्टर इसकी शुरुआत मानी जा रही है। कुछ और कांग्रेस नेता भी मुखर होकर विरोध पर उतर आए हैं । भाजपा भले ही ज्योतिरादित्य की बदौलत सरकार में आई हो मगर उप चुनाव में ज्योतिरादित्य को चेहरा मानने के लिए भाजपा नेता तैयार नहीं है। भाजपा प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल ने करैरा के पूर्व विधायक जसवंत जाटव द्वारा दिए गए ज्योतिरादित्य सिंधिया को उपचुनाव में चेहरा बनाने संबंधी बयान का तत्काल प्रतिकार करते हुए स्पष्टीकरण दिया था कि प्रदेश में भाजपा का चेहरा तो शिवराज ही हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया आने से भाजपा की ताकत बढ़ गई है।
पिछले दिनों पोहरी में केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के ग्वालियर में लगाए जा रहे गुमशुदगी संबंधी पोस्टर्स पर चुटकी लेते हुए बयान दिया था कि ज्योतिरादित्य सिंधिया कोई जनप्रतिनिधि नहीं हैं। ऐसे में उनके पोस्टर क्यों लगाए जा रहे हैं ? भले ही उनके कहने का आशय तकनीकी रूप से सही हो क्योंकि वे (सिंधिया) इस समय किसी सदन के सदस्य नहीं है और वे सीधे तौर पर जनता के प्रति जवाबदेही भी नही, मगर उनकी इस तरह की चुटकीली बयानी ने सिंधिया खेमे की बेचैनी बढ़ा डाली है।
इस बात पर दो राय नहीं कि ग्वालियर-चंबल संभाग में जहां 16 सीटों पर आमने सामने का मुकाबला होना है उन सीटों पर ज्योतिरादित्य सिंधिया एक बड़ा चेहरा हैं और उनके प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता। भारतीय जनता पार्टी भी फिलहाल अपने घर को दुरुस्त करने में लगी हुई है। इसलिए एकदम सिंधिया पर समर्पित भाव दर्शाने से बच रही है।
शिवराज मंत्रिमंडल का विस्तार प्रदेश के सियासी हालातों को काफी हद तक स्पष्ट कर देगा और इससे ही यह आभास भी हो जाएगा कि भाजपा ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों को लेकर क्या सोच रखती है?
अपनों के साथ बीजेपी के बागियों को साधना : सिंधिया के सामने अब दोहरी चुनौती है। पहले तो उन्हें अपने सभी समर्थकों को साध कर रखना है और उपचुनाव की रणनीति तैयार करनी है वहीं दूसरी तरफ बीजेपी के उन संभावित बागियों को भी साधने की चुनौती होगी जो चुनाव में सिंधिया समर्थकों का खेल खराब कर सकते हैं। अकेले ग्वालियर की 16 सीटों पर बीजेपी के कई दिग्गजों ने सिंधिया समर्थकों से पिछले विधानसभा चुनाव में हार का स्वाद चखा था।’’वे भी अब किसी भी कीमत पर हिसाब चुकता करने के मूड में हैं। ऐसे में सिंधिया को अपनों की नैया पार लगाना अभी चुनौती भरा साबित हो सकता है! क्योंकि जिस सम्मान की चाह में बदली थी राह…. वही हो गई है बेपरवाह !!


 

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