राजनीति

शिव”राज” का सकंट: कल नहीं होगा मंत्रिमंडल का विस्तार और बढ़ा इंतजार..CM फिर जाएंगे दिल्ली दरबार

  • शिवराज की चौथी पारी इस बार उन पर ही भारी पड़ रही है। बेशक प्रदेश में भाजपा की सरकार है लेकिन वे चाह कर भी अपनी मनमर्जी के निर्णय नहीं ले पा रहे हैं और न ही अपनों को उपकृत कर पा रहे हैं। कारण इस बार सत्ता और संगठन में सारे समीकरण ही बदल गए हैं। सिंधिया की आमद ने पार्टी के दिग्गजों का गणित बिगाड़ दिया है। तो नरोत्तम मिश्रा के बढ़ते कद ने सिंधिया की सक्रियता ने युवा चेहरों में जोश भर दिया है। यही कारण है कि कभी वन मैन शो की तर्ज पर  सरकार  चलाने वाले शिवराज सिंह  के लिए इस बार कैबिनेट का विस्तार गंभीर चुनौती बन गया है। सभी को साधने और सिंधिया के लोगों को एक साथ रखने के फेर में अपनों के बिखरने का खतरा बढ़ गया है।

राजनीतिक संवाददाता। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने चौथी बार राज्य की बागडौर संभालते वक्त कभी भी यह नहीं सोचा होगा कि इस बार सरकार चलाना उनके लिए भारी पड़ जाएगा। कारण स्पष्ट है कि सबको साधने के फेर में वे 100 दिन बाद भी अपने मंत्रिंमंडल का पूर्ण रूप से विस्तार नहीं कर पाए हैं। पार्टी नेताओं की मानें तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एक बार फिर अपनी बात मनवाने के लिए दिल्ली का रुख कर सकते हैं। लेकिन साथ ही उन्होंने दावा भी किया है कि गुरुवार को मंत्रिमंडल विस्तार हो सकता है। बेशक गुरूवार को मंत्रिमंडल का विस्तार हो जाए लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि सिंधिया की पार्टी में आमद से शिवराज का सत्ता और संगठन पर काबू नहीं रहा !
मंत्रियों के चयन बना मुसीबत
नए और युवा चेहरे विष्णुदत्त शर्मा को पार्टी ने प्रदेशाध्यक्ष तो बना लिया, लेकिन यह पहला अवसर है, जब मंत्रियों के चयन पर नेताओं के बीच सहमति नहीं बन पा रही है। खुद को सबसे अनुशासित पार्टी बताने वाली भाजपा दो माह में भी शिवराज मंत्रिमंडल के विस्तार की कवायद को परिणाम में नहीं बदल सकी। पार्टी नेताओं का मानना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, प्रदेश संगठन और केंद्रीय नेतृत्व का सुर सरकार में भी पीढ़ी परिवर्तन पर एक है। यही कारण है कि शिवराज मंत्रिमंडल का विस्तार पर एक बार फिर मंगलवार को टाल दिया गया।

शाह ने की थी बदलाव की शुरुआत
दरअसल, पार्टी में पीढ़ी परिवर्तन की शुरुआत भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते हुए अमित शाह ने की थी, जिसे राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष आगे बढ़ा रहे हैं। शाह ने 2018 के चुनाव में ही एक सीमा रेखा खींच दी थी, जिसमें मप्र के वयोवृद्ध बाबूलाल गौर, सरताज सिंह, कुसुम महदेले, रामकृष्ण कुसमरिया जैसे नेताओं के टिकट कट गए थे। इसके बाद भाजपा के संगठन चुनाव हुए तो सबसे पहले मंडल अध्यक्ष के लिए 35 साल की उम्र सीमा तय की गई। इसके बाद जिलाध्यक्षों के लिए भी 50 साल की लक्ष्मण रेखा खींच दी। कुछ अपवाद जरूर रहे, लेकिन बाकी सभी पदों के लिए नए चेहरों को भाजपा ने मौका दिया।
बारी शिवराज के मंत्री चुनने की
अब बारी प्रदेश संगठन के पदाधिकारी और शिवराज सरकार में मंत्रियों को चुनने की है। सूत्रों का कहना है कि दिल्ली में चली कवायद के बाद भी मंत्री पद के दावेदारों के नाम फाइनल नहीं हो पाए। आशय साफ है कि सरकार में बरसों से जमे लोग अपना स्थान नहीं छोड़ना चाह रहे हैं। इधर, पार्टी में सक्रिय मौजूदा पीढ़ी पर नजर दौड़ाएं तो सारे नेता 1985 से 1990 के आसपास में पार्टी में आए थे। शिवराज सिंह चौहान, गोपाल भार्गव, कैलाश विजयवर्गीय, अजय विश्नोई, गौरीशंकर बिसेन, चौधरी चंद्रभानसिंह, उमाशंकर गुप्ता, कुसुम महदेले, विजय शाह, डॉ. गौरीशंकर शेजवार, नरोत्तम मिश्रा और लक्ष्मीकांत शर्मा जैसे कद्दावर नाम इनमें शामिल हैं। उस दौरान जिस पीढ़ी को तत्कालीन नेता सुंदरलाल पटवा पार्टी में लेकर आए थे, उनमें अब इनमें से कुछ चुनाव हार गए, कुछ बाहर हो गए तो कुछ अभी भी जमे हुए हैं।

भाजपा विचारधारा आधारित कार्यकर्ता केंद्रित और अलहदा कार्यपद्धति वाली पार्टी है। इसके हर निर्णय सामूहिक चिंतन और परस्पर चर्चा से ही होते हैं। सब मिलकर जो निर्णय करेंगे, वह न केवल पार्टी और सरकार के हित में बल्कि राजनीतिक जगत के लिए भी दिशा देने वाले होंगे –
रजनीश अग्रवाल, प्रवक्ता, भाजपा मप्र।


खबर में जागरण डिजिटल से इनपुट लिया गया है |

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