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जीते ज्योतिरादित्य : एक बार फिर लोकतंत्र के उच्च सदन में दिखेगी सिंधिया परिवार की उपस्थिति

  • 17वीं  लोकसभा के लिए ग्वालियर-चंबल की सीटों पर 12 मई 2019 को हुए तीसरे चरण के मतदान के बाद 23 मई गुरुवार के दिन देशभर के लोगों को लोकसभा चुनावों के परिणाम का इंतजार था। सुबह से ही टीवी पर नजरें टिकाए बैठे रहे और दोपहर बाद तक नतीजों की तस्वीर स्पष्ट नजर आने लगी थी। लेकिन इन सब के बीच आम और खास के साथ ही प्रदेश और देश के राजनीतिक विश्लेषकों की नजरें मध्य प्रदेश की गुना-शिवपुरी संसदीय सीट पर भी टिकी हुईं थीं। यह देश की सर्वाधिक चर्चित सीटों में से एक जो थी, जहां से ग्वालियर की पूर्व रियासत के मुखिया ज्योतिरादित्य सिंधिया पॉंचवी वार चुनाव मैदान में थे। लेकिन अंतिम परिणाम आया तो हर कोई हैरान और परेशान था। क्योंकि अपराजेय सिंधिया परिवार का मुखिया राजनीति के रण में शिकस्त खा चुका था। इस हार ने 62 साल की उस पंरपरा पर विराम लगा दिया जब सत्रहवीं लोकसभा में परिवार का कोई सदस्य अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करा सका। लेकिन आज एक बार फिर 393 दिन के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया के राज्य सभा के लिए चुनने से उनकी राजनीति पर लगा ग्रहण हट गया है। अब उच्च सदन में सिंधिया की मौजूदगी नजर आएगी।

    विजय पाण्डेय @ ग्वालियर

  • राजमाता विजयाराजे सिंधिया रहीं हो या माधवराव सिंधिया या फिर मौजूदा यशोधरा राजे सिंधिया और ज्योतिरादित्य सिंधिया ये राजनीति की ऐसी शख्यियत हैं…. और ऐसे नाम हैं, जिन्हें लेते ही लोगों के चेहरे के भाव बदल जाते हैं।
    ** 62 साल के बाद 2019 में पहली बार सिंधिया परिवार से कोई नहीं पहुंचा संसद
    ** ज्योतिरादित्य की एक हार से टूट गई थी परिवार के संसद में पहुंचने की परंपरा

    ज्योतिरादित्य सिंधिया का मुस्कराता चेहरा लोगों के चेहरों की रंगत बदलने के लिए काफी होता है। लेकिन पिछले साल मिली राजनीतिक शिकस्त ने लोगों के चेहरे पर खुशिया बिखरने वाले सिंधिया के चेहरे की ही रंगत उड़ा कर रख दी थी। एक हार ने सिंधिया परिवार के करिश्माई तिलिस्म को भी तोड़ कर रख दिया और वे पहले ऐसे सदस्य बने जो कि अपनी परंपरागत सीट गुना-शिवपुरी से चुनाव हार गए।
    यह वह सीट थी जहां से यदि सिंधिया परिवार का सदस्य भी चुनाव नहीं लड़ता था तो उनकी पसंद का ही प्रत्याशी जीत हासिल करता था। कारण स्पष्ट है कि इस सीट की राजनीति का केंद्र बिंदु  सिंधिया राजपरिवार ही हुआ करता था। चाहे राजमाता विजयाराजे सिंधिया रही हों या उनके पुत्र माधवराव सिंधिया और 2002 से ज्योतिरादित्य सिंधिया। इन्होंने अपने चुनावी रण का आगाज यहीं से किया था। दादी, बेटा और नानी यानी तीनों ने ही पहली चुनावी जीत इसी लोक सभा सीट से हासिल कर अपने राजनीतिक कॅरियर को नई पहचान देकर परवान चढ़ाया।
    पार्टी बदलीं लेकिन हारे कभी नहीं
    1957 में सर्व प्रथम राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने गुना लोकसभा सीट से अपना पहला चुनाव लड़ा।….1971 में उनके बेटे माधवराव सिंधिया जनसंघ से मैदान में उतरे और चुनाव जीते। 30 सितबंर 2001 को उत्तर प्रदेश में एक हवाई जहाज दुर्घटना में माधवराव सिंधिया की आकस्मिक मृत्यु के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 2002 में कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में उपचुनाव में अपने राजनीतिक कॅरियर की शुरूआत की। उन्होंने पहले ही चुनाव में अपने निकटतम प्रतिद्वंदी भाजपा के देशराज यादव को चार लाख 50 हजार मतों से शिकस्त देकर शानदार जीत हासिल कर सिंधिया परिवार की विजयश्री की पंरपरा को कायम रखा। इसके बाद वे लगातार चार चुनाव जीते। लेकिन 2019 के आम चुनाव में वे अपनी सीट को गंवा बैठे। ….और इस हार ने तोड़ कर रख दी 62 साल से निरंतर उच्च सदन में पहुंचने की पंरपरा।
    62 साल के सफर पर एक नजर (गुना)
    1957 : विजयाराजे सिंधिया,कांग्रेस
    1967 : विजयाराजे सिंधिया, स्वतंत्रता पार्टी
    1971ः माधवराव सिंधिया, जनसंघ
    1977ः माधवराव सिंधिया, निर्दलीय
    1980 : माधवराव सिंधिया, कांग्रेस
    1989 से 1998 तक विजयाराजे सिंधिया, भाजपा
    1999- माधवराव सिंधिया, कांग्रेस
    2004 से 2014 तक ज्योतिरादित्य सिंधिया, कांग्रेस
    नोट- यह गुना सीट का विवरण है। इसके अलावा ग्वालियर सीट से भी सिंधिया परिवार के सदस्यों ने चुनाव जीते हैं।
    1962 : विजयाराजे सिंधिया, कांग्रेस (ग्वालियर)
    1984-1989-1991 : माधवराव सिंधिया, कांग्रेस
    1996 : माधव राव सिंधिया, मप्र विकास कांग्रेस
    1998 : माधवराव सिंधिया, कांग्रेस
    2007 -2009 : यशोधरा राजे सिंधिया, भाजपा
    राजनीति नहीं रिश्तों ने दिलाई सदैव जीत
    सिंधिया परिवार का आमजन के साथ राजनीतिक नहीं एक परंपरागत रिश्ता था। जो उन्हें हमेशा जनाधार से जोड़े रहा। राजमाता विजयाराजे और माधवराव सिंधिया ने इस रिश्ते को बड़ी शालीनता और मर्यादा के साथ निभाया भी था। यही उनकी सबसे बड़ी पूंंजी थी, जिसने उन्हें अपराजेय योद्धा बनाया था। यही कारण था कि राजमाता जीवन के अंतिम क्षणों तक सांसद रहीं और तो और जनता के बीच उनके सम्मान की तासीर तो देखिए कि वे अपना अंतिम चुनाव तो अस्पताल में रहते हुए ही जीत गईं। माधवराव सिंधिया भी इसी तरह विजय पताका फहराते रहे। मुख्यधारा की चाह में उन्होंने कांग्रेस की राह पकड़ी थी। उन्होंने कभी कोई विकास का दावा नहीं किया और न ही जनता ने उनसे कोई सवाल। बावजूद इसके वे विकास के मसीहा कहलाए। यह उनके आमजन के साथ जुड़ाव का ही प्रभाव था। उन दोनों की सबसे बड़ी खासियत थी कि उन्होंने राजनीतिक तौर पर लोगों को बंटने नहीं दिया। अपने विरोधियों के खिलाफ अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल नहीं किया। परिणामस्वरूप वे अपराजेय रहे।
    ज्योतिरादित्य नहीं रख सके परंपरा को कायम
    49 वर्षीय ज्योतिरादित्य सिंधिया लगातार 17 वर्षों तक सांसद रहने के बावजूद अपनी दादी और पिताजी के जनता के साथ स्थापित किए गए गरिमामय रिश्तों को कायम नहीं रख सकें। कैंपियन और दून स्कूल देहरादून से स्कूल शिक्षा के बाद 1993 में हॉर्वर्ड कॉलेज से स्नातक और फिर 2001 में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से एमबीए की डिग्री हासिल कर पिताजी के असमय निधन के चलते सीधे राजनीति में प्रवेश किया। रियासत रूपी विरासत के रूप में मिली राजनीति में पहले ही चरण में मिली रिकॉर्ड जीत ने उन्हें सातवे आसमान पर पहुंचा दिया। लेकिन वे जीत के पीछे के कारणों का सम्मान नहीं कर पाए। अपनी विदेशी शिक्षा के रंग में रंगे वे राजनीति में एक मल्टी नेशनल कंपनी के सीईओ की भांति उपयोग दंभ भरने लगे। उनकी यही शैली लोगों को रास नहीं आई और धीरे-धीरे उनसे लोग कटने लगे। परिणाम स्वरूप उनका जीत का अंतर कम होता गया और पूरे अंचल में विरोधियों की भरमार हो गईं। उनके संसंदीय क्षेत्र में एक बड़ा तबका सिर्फ और सिर्फ सिंधिया परिवार के सदस्य को ही शिरमौर मानता था वह भाजपाई के रूप में परिवर्तित हो गया। उन्होंने विकास के दावे और श्रेय लेने की होड़ में अपनी गरिमा को तार-तार कर दिया। बदले की भावना ने राजनीतिक कद को अप्रत्याशित रूप से कमतर कर दिया। यही कारण रहा है कि जब यह खबर टीवी पर आई और अखबारों में छपी कि ज्योतिरादित्यं ”सिंधिया चुनाव हारे“ तो लोगों को अकल्पनीय और अविश्वनीय लगी, बावजूद इसके लोगों ने उस हार को स्वाभाविक भी करार दिया। लेकिन हकीकत यह भी थी कि सिंधिया को मिली पराजय ने 62 साल के इतिहास के गौरवशाली इतिहास पर सवाल खड़े कर दिए!
    एक हार ने बदली अंचल की राजनीति 
    ज्योतिरादित्य सिंधिया की हार को बेशक राजनीतिक पंडितों ने मोदी लहर से जोड़कर विश्लेषित किया। लेकिन प्रदेश की राजनीति और ग्वालियर-चंबल अंचल के लिए यह हार लोगों की सोच से परे थी। क्योंकि इस एक हार ने सिंधिया राजघराने के करिश्माई प्रभाव के तिलिस्म को तोड़ कर रख दिया। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गॉंधी और अटल विहारी बाजपेयी की हार के बाद देश के प्रमुख राजघरानों में ग्वालियर की पूर्व रियासत की सियासत को अभेद दुर्ग माना जाता था। जो पिछले साल 2019 तक अपराजेय था। हालांकि 1984 में ज्योतिरादित्य सिंधिया की बड़ी बुआ बसुंधरा राजे भिंड लोकसभा क्षेत्र से चुनाव हार चुकी हैं। लेकिन उच्च सदन में परिवार का सदस्य 62 वर्षों से निरंतर प्रतिनिधित्व कर रहा था। अचंल में परिवार के लिए राजनीतिक दल उसकी पहचान नहीं बल्कि राजशाही को राजमाता और महाराज के रूप में सर्वमान्यता थी। ज्योतिरादित्य सिंधिया की हार ने सिंधिया राजपरिवार की इस मान्यता और बादशाहत को धराशायी कर दिया। आजाद भारत का यह एक सुखद पहलू रहा था कि सिंधिया राजपरिवार ने स्वतंत्रता के 72 वर्षों के बाद भी राजतंत्र (सामंतशाही) और लोकतंत्र के बीच बेहतर तालमेल बनाकर अपनी परंपरा को कायम रहा। लेकिन एक हार ने यह भी साबित कर दिया कि अब सामंतवाद के दिन लद रहे हैं। जनता से जुड़ाव ही आपको राजनीति में जननायक बना सक सकता है। हो सकता है कि यह कड़वा सच सिंधिया परिवार को रास न आए और उनके समर्थकों को नागवार गुजरे लेकिन हकीकत तो यही है कि मौजूदा परिवेश में सिंधिया आमजन की नब्ज को टटोलने में नाकामयाब रहे हैं। यही वजह उनकी हार का कारण बनीं।

    अब जीत के साथ मिली नई जिम्मेदारी
    393 दिन बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया एक बार फिर सांसद चुने गए हैं। इसके साथ ही उनके राजनीतिक कॅरियर पर लगा ग्रहण हट गया है। लेकिन इस बार परिस्थितियां और तस्वीर दोनों ही बदली हुई हैं। एक तो यह कि सांसद तो जरूर बने हैं लेकिन जनता के मत से नहीं जनप्रतिनिधि के वोट से चुने गए हैं। वह भी उच्च सदन की राज्य सभा के लिए। दूसरी बात वह अब कमल दल से सांसद निर्वाचित हुए हैं। ऐसे में इस जीत के साथ ही अब उनके पास नई जिम्मेदारियां भी होगी। शायद कुछ दिनों बाद केंद्रीय मंत्री के रूप में भी ताजपोशी हो जाए। लेकिन सवाल उठता है कि क्या वे हार के सबक और पिछले सवा साल में पूर्ववर्ती पार्टी की उपेक्षा की कसक से उभर कर अब राजनीति को नई पहचान देकर अपने और जनता के बीच के रिश्तों को एक नई मजबूती देकर सिंधिया परिवार की परंपरा को कायम रखने का प्रयास करेंगे?

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