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सूबे की सियायत : सिंधिया पर रार, संकट में सरकार

सूबे की सियासस में मचा बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा है। सत्ता और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोपों का दौर जारी है। कांग्रेस जहां भाजपा पर विधायकों की खरीद-फरोख्त कर प्रदेश सरकार को गिराने की बात कर रही है तो वहीं भाजपा इसे कांग्रेस की आंतरिक कलह करार देकर हॉर्स ट्रेडिंग के घटनाक्रम से पल्ला झाड़ रही है। यदि हॉर्स ट्रेडिंग को भी नकार दिया जाए तो सियासी घमासान ने सत्तारूढ़ कांग्रेस के नेताओं की नींद हराम तो कर ही रखी है। इसकी वजह ज्योतिरादित्य सिंधिया की लगातार की जा रही अनदेखी भी हो सकती है। ऐसे में कहा जा सकता है कि यदि सिंधिया पर हुई रार तो फिर संकट में रहेगी सरकार।

पार्टी आलाकमान चाहता है सिंधिया का बढ़े कद प्रदेश के नेता नहीं चाहते मिले उन्हें कोई भी पद
  • विजय पाण्डेय
    दो दिन पहले आधीरात को घटित हुए अप्रत्याशित घटनाक्रम के बाद कांग्रेस ने भाजपा पर धन-बल के आधार पर प्रदेश की सरकार को अस्थिर करने का आरोप लगाया है। इसके परे भाजपा ने सूबे में मचे सियासी बवाल को कांग्रेस की अंतर्कलह का परिणाम बताया है। हकीकत क्या है? इसकी सच्चाई तो देर-सबेर सबके सामने आनी ही है लेकिन
  • माना यह भी जा रहा है कि राज्यसभा के लिए होने वाले आगामी चुनाव को देखते हुए यह बवाल मचा हुआ है। मध्य प्रदेश से पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्यसभा में भेजने के मामले पर पार्टी में व्याप्त गुटबाजी के चलते विधायकों की उछल-कूंद देखने को मिल रही है। क्योंकि माना जा रहा है कि किसी को पैसे की भूख है तो किसी को अपने नेता के प्रति वफादारी?
  • आपको बता दें कि इस बार प्रदेश से राज्यसभा की तीन सीटें खाली हो रही हैं। इसी माह के अंत में उन्हें भरे जाने की चुनावी प्रक्रिया होनी है। मौजूदा तौर पर फिलहाल प्रभात झा व सत्यनारायण जटिया भाजपा से तो कांग्रेस से दिग्विजय सिंह सदस्य हैं। यदि संख्या बल की बात करें तो इस बार कांग्रेस का पलड़ा भारी है और वह दो नेताओं को राज्य सभा भेजना चाहती है। इनमें पहला नाम दिग्विजय सिंह का तय माना जा रहा है। जबकि दूसरे सदस्य के तौर पर पार्टी आलाकमान ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी राज्यसभा में भेजने का मन बना चुका है।
  • सूत्रों की मानें तो आलाकमान ज्योतिरादित्य सिंधिया की पार्टी में उपयोगिता और महत्व को देखते हुए उन्हें उच्च सदन में भेजना चाहता है लेकिन सूबे की राजनीति से जुड़े नेता नहीं चाहते है कि बड़े उनका कद।
    इस बात को भी नहीं नकारा जा सकता कि सूबे में कांग्रेस के कितने गुट हैं? इनमें से अधिकांश सिंधिया के खिलाफ हैं। मुख्यमंत्री कमलनाथ का उनसे छत्तीस का आंकड़ा है। जबकि अन्य बड़े नेता भी प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से उनके विरोध में खड़े नजर आते हैं। यही वजह है कि सरकार बनने के एक साल बाद भी प्रदेश भर के समर्थकों की मांग के बावजूद आज तक उन्हें पीसीसी चीफ नहीं बनाया गया। जबकि कमलनाथ मुख्यमंत्री होने के साथ ही प्रदेश अध्यक्ष भी बने हुए हैं। प्रदेश में कुछ ऐसे नेता भी हैं जो इसी लड़ाई का फायदा उठाकर सदन में पहुंचने की हसरत पाले हुए हैं लेकिन सिंधिया के प्रभाव के चलते वे सामने आकर कुछ नहीं बोल पा रहे हैं। सिंधिया विरोधी नेताओं की चाह है कि पार्टी हाईकमान सिंधिया को छत्तीसगढ़ से राज्य सभा भेज दे। जबकि प्रदेश की जनता से पारिवारिक रिश्ता रखने और राजनीति में अपना रंग जमाने वाले सिंधिया हर हाल में सदन में अपने राज्य का ही प्रतिनिधित्व चाहते हैं।
    अब यदि करें, दो दिन चले पॉलिटिकल ड्रामे के बाद मुख्यमंत्री कमलनाथ और पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता के दावे की, कि अब सरकार को कोई खतरा नहीं है तो यह अभी जल्दबाजी भी हो सकती है। इस दावे के आधार पर तो यह कहना लाजमी होगा कि सभी विधायक पार्टी के एक सूत्र में बंधे हुए हैं? उनके विरोध की वजह भाजपा का करोड़ों का प्रलोभन और पार्टी की गुटबाजी भी हो सकती है। पार्टी में जिस तरह से अंतर्कलह चल रही है, यह जग जाहिर है। सिंधिया भी कई बार अपनी ही सरकार और उसके मुखिया की नीतियों पर सवाल खड़े कर चुके हैं। उनके समर्थक विधायकों की भी उपेक्षा की जा रही है। मुरैना, श्योपुर, ग्वालियर और भिंड के प्रभारी मंत्रीं विधायकों को तबज्जों नहीं दे रहे हैं। ऐसे में विधायकों में भी मुख्यंत्री और मंत्रियों को लेकर नाराजगी बनी हुई है।जबकि कुछ विधायक वरिष्ठ होने के बावजूद मंत्री नहीं बनाए गए हैं। विधायकांं की खरीद-फरोख्त के मामले में बेशक भाजपा के नेता स्पष्ट तौर पर कह चुके हैं कि इस मामले से उनका कोई लेना-देना नहीं है। इस बात से बेफिक्र होकर कर कमलनाथ भले ही सरकार पर संकट न होने के दावे कर रहे हों। लेकिन सिंधिया समर्थक विधायकों के नाम खरीद-फरोख्त वाली फेहरिस्त में जुड़ने पर उसके अन्य कारण भी हो सकते हैं। क्योंकि वे भी नहीं चाहते कि उनके नेता की अनदेखी हो। यदि उन पर प्रहार होता है तो फिर यह तय माना जाए कि संकट में आ ही जायेगी सरकार।
  • Posted By : Vijay Pandey

 

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